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21 Jun 2020

pauranik rahasyamayi kahaniya- Reincarnation:- एक रहस्यमय पौराणिक कथा

हिंदी कहानियां [Hindi kahaniya]

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मैंने अपने इस ब्लॉग में आपको कुछ समय पहले पुर्नजन्म से जुड़ी हुई कुछ घटनाओं के बारे में बताया था। लेकिन आज मैं आपको जो बताने जा रहा हूँ वो एक हिन्दू पौराणिक कथा है यह गाथा जिन पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है जाहिर तौर पर आप उनके किसी न किसी जन्म के बारे में जानते होंगे। आखिर कौन है वो पात्र? और क्यों उन्होंने बार-बार इस दुनियां में जन्म लिया क्या कारण था इसके पीछे आईये जानते है।



हमारे पुराणों शास्त्रों में न जाने कितनी कथा-कहानियां मौजूद है जिससे बहुत कम लोग परिचित हैं। आज मैं आपको जिस कथा से रूबरू करवा रहा हूँ उसे जानकर आप जाहिर तौर पर हैरत में पड़  जायेंगे। हो सकता है आप में से कई लोगों इस कथा से परिचित हो, या कुछ ऐसे भी होगें जिन्हें इस कथा का ज्ञान नहीं होगा। यदि हम अपने पौराणिक कथा कहानियों को खंगाले तो न जाने कितने हैरान करने वाले किस्से कहानियां हमारे सामने आएंगी। तो हो जाईये मेरे साथ इस सफ़र के लिए तैयार आज मैं आपको जिन पात्रों के बारे में बताने जा रहा हूँ उनका नाम है जय और विजय।





हम कथा की शुरूआत करते है भगवान विष्णु के वैकुण्ठ लोक से जहां जय और विजय नामक दो भाई वैकुण्ठ लोक के द्वार पाल थे। एक बार जब यह दोनों पहरा दे रहे थे तो इन्होंने देखा की कुछ ऋषि कुमार वैकुण्ठ लोक की ओर चले आ रहे है। करीब आने के बाद ऋषि कुमारों ने जय-विजय से भगवान विष्णु मिलने की इच्छा जताई यह ऋषि कुमार कोई ओर नहीं बल्कि सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार थे, यह चारों सनकादिक ऋषि भी कहलाते है इन्हें देवताओं का पूर्वज माना जाता है। जय और विजय ने इन ऋषियों को द्वार पर ही रोक लिया और वैकुण्ठ लोक के भीतर जाने से मना करने लगे। जय और विजय के इस प्रकार व्यवहार करने से यह चारों ऋषि काफी क्रोधित हुए और उन्होंने गुस्से में आकर कहा हम भगवान विष्णु के परम भक्त है और तुम दोनों हमें उनके दर्शन करने से रोक रहे हो। क्या तुम हमें नहीं जानते हो? तुम दोनों वैकुण्ठ लोक के पहरेदार होकर भी अहंकार से चूर हो चुके हो इसी कारण तुमने यह दु:साहस किया और हमें प्रभु के दर्शन करने से रोका तुम दोनों ने जो पाप किया है इसकी सज़ा यही है कि तुम दोनों पाप योनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो। सनकादिक ऋषि के शाप से दोनों इतने डर गए कि उन्होंने तुरंत ही ऋषियों के चरण पकड़ लिए और क्षमा याचना करने लगे।





जब भगवान विष्णु के इस बारे में पता चला तो वह अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ स्वयं द्वारा पर आए और कहा "हे ऋषिवरों! ये जय और विजय मेरे पार्षद हैं। इन दोनों ने अहंकार वश आपका अपमान करके अपराध किया है। इन्होंने आपकी अवज्ञा नहीं बल्कि स्वयं मेरी अवज्ञा की है और इसकी सजा इनको मिलनी ही चाहिए थी आप लोगों ने इन दोनों अहंकारियों की शाप देकर बहुत अच्छा कार्य किया है। भगवान विष्णु के इन विनम्र वाणी को सुनकर ऋषि कुमारों को बेहद दुख हुआ और उन्होंने दोनों को अपने शाप से मुक्त करने की बात कहीं लेकिन भगवान विष्णु ने कहा, "हे मुनिवरों! मैं ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता क्योंकि इससे धर्म का उल्लंघन होता है। आपने जो इन दोनों को शाप दिया है यह मेरी ही लीला थी। ये दोनों अवश्य ही इस दण्ड के भागी हैं। यह दैत्य योनि को प्राप्त करेंगे और मेरे द्वारा इनका संहार होगा। इसके बाद ये पुनः इस धाम में वापस आ जायेंगे।





जिस कारण जय को हिरण्याक्ष, रावण और अंत में शिशुपाल का अवतार लेना पड़ा। वही विजय को हिरण्यकशिपु, कुंभकर्ण और कंस के रूप में जन्म लेना पड़ा। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों दक्ष प्रजापति की पुत्री दिति और कश्यप की संतान थे इन्हें मारने के लिए भगवान विष्णु ने वाराहावतार लिया था।



रावण और कुंभकर्ण कैकसी और मुनि विश्रवा के पुत्र थे इनका वध करने के लिए भगवान विष्णु ने राम के रूप में जन्म लिया।





शिशुपाल और कंस का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया था। शिशुपाल दमघोष का पुत्र और श्री कृष्ण का मौसेरा भाई था जिसके 100 अपराध क्षमा करने के बाद श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया था। इसी प्रकार कंस जो उग्रसेन के पुत्र थे और रिश्ते में कृष्ण के मामा लगते है इनका वध भी भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के हाथों हुआ था।



इस प्रकार जय और विजय ने अपने तीनों जन्म पूरे कर लिए और हर जन्म में उन्हें उनके शाप से मुक्त कराने के लिए स्वयं भगवान विष्णु को आना पड़ा इस प्रकार दोनों भाईयों को सनकादिक ऋषि के शाप से मुक्ति मिली और वह पुन: वैकुण्ठ लोक में चले गए और भगवान विष्णु की सेवा में लग गए।



ऐसी ही न जाने कितने किस्से व कहानियाँ मौजूद है जिनमें किसी न किसी किरदार ने, ना जाने कितने जन्म लिए और फिर इस दुनियां से अलविदा हो गया। हो सकता है आप भी उनमें से एक हो? तो अगली बार जब भी आप अपने बारे में गंभीरता से सोचे तो यह जरूर जान लीजियेगा कि आपका यह जन्म पहला नहीं है। इससे पहले भी आप कई और जन्म ले चुके है फर्क सिर्फ इतना है आपको इसका ज्ञान नहीं है कि आप किस जन्म में क्या थे।

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